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Podcast With Shubham Verma

Podcast With Shubham Verma

Von: Shubham Verma
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Welcome to the Podcast With Shubham Verma podcast! I'm your host, [Shubham Verma], and I'm here to talk about Fiction. Each week, we'll discuss Hindi Dramas, and I'll bring on guests to share their expertise and insights. Whether you're a beginner or a seasoned pro, I hope you'll find this podcast to be informative, entertaining, and inspiring. You can subscribe to the podcast on Spotify, Amazon Music, iTunes & Google Podcast. I hope to see you there!Shubham Verma
  • Bollywood Ke Pahle Natural Actor | Podcast With Shubham Verma | #podcast #bollywood #kajol #oldsong
    Jul 30 2023
    आज हम बात करेंगे हिन्दी सिनेमा के उस पहले नैचुरल एक्टर के बारे में जो स्टूडियो में गए तो थे फिल्म की शूटिंग देखने मगर निर्देशक ने उन्हें फ़िल्म के हीरो का रोल ऑफर कर दिया। आप जान कर हैरान हो जाएँगे कि ये एक्टर मशहूर अभिनेत्री काजोल की नानी के प्यार में पागल थे, यहाँ तक की अपने प्रेम का इज़हार करने के लिए उस जमाने में हेलीकॉप्टर से ना सिर्फ अपने प्रेम का इजहार किया, बल्कि समाज के सामने बेबाकी से अपने रिश्ते को माना भी। Hello मेरा नाम है शुभम & this is "Podcast With Shubham Verma" [Intro Music] हिन्दी सिनेमा में कुछ अभिनेता ऐसे भी हुए, जिन्होंने नैचुरल एक्टिंग के सहारे कामयाबी हासिल की। इस कोटि में मोतीलाल सबसे प्रमुख थे। मोतीलाल लगातार 33 साल तक नायक या चरित्र-नायक के रूप में फिल्मी परदे पर दर्शकों को अपने अभिनय से रोमांचित किया। मोतीलाल हिन्दी-सिनेमा के दर्शकों को अभिनय की एक नई शैली से रू-ब-रू कराया। फिल्म-जगत में मोतीलाल को दादामुनि अशोक कुमार की ही तरह बड़ा माना जाता था। उनके खाते में अनेक अच्छी फिल्में दर्ज हैं। मोतीलाल का जन्म 4 दिसंबर 1910 को शिमला में हुआ था वे दिल्ली के एक सुसंस्कृत परिवार से थे। उनके पिता शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर थे। मोतीलाल एक साल के ही थे कि पिता चल बसे। उनके परिवार को चाचा के घर रहना पड़ा, इन चाचा ने मोतीलाल एवं उनके पाँच भाई-बहनों की परवरिश की। चाचा ने ही मोतीलाल को जीवन के प्रति उदारवादी नजरिया दिया। शिमला के अंग्रेजी स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद मोतीलाल ने पहले उत्तर प्रदेश, फिर दिल्ली में पढ़ाई की। स्नातक की उपाधि उन्होंने दिल्ली से ली। मोतीलाल नेवी ज्वॉइन करने के इरादे से मुंबई पँहुचे थे, पर परीक्षा के दिन वो बीमार हो गए और प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाए और उस वक़्त उन्हें इस बात का रंज था। एक दिन मोतीलाल शानदार कपड़े पहनकर शूटिंग देखने के इरादे से सागर स्टूडियों जा पहुँचें। वहाँ डायरेक्टर कालीप्रसाद घोष किसी सामाजिक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। घोष बाबू तेज-तर्रार युवा मोतीलाल को देखकर दंग रह गए, क्योंकि अपनी फिल्म के लिए उन्हें ऐसे ही हीरो की तलाश थी, बस फिर क्या था घोष बाबू ने अपनी फिल्म ‘शहर का जादू’ (1934) के नायक के रूप में उन्हें चुन लिया और नायिका सविता देवी के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। मोतीलाल ने ...
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    8 Min.
  • Chandramohan - India's Cat Eyed Actor || Podcast With Shubham Verma || #podcast
    Jul 23 2023
    एक एक्टर जो भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में 1930 और 40 के दशक में अभिनय का बेताज़ बादशाह था जिसके डायलॉग ही नहीं बल्कि आँखें भी बोलती थी, जो फिल्मों में रोल तो विलेन के करता था पर फ़िल्म की हिरोइन भी उसके अभिनय और आंखों की दीवानी थी। और आपको बताएंगे कि आख़िर ऐसा क्या हुआ जो के.आसिफ़ की महत्वाकांक्षी फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म में मुख्य किरदार अकबर की भूमिका में पहली पसंद होने के बावजूद भी इस फ़िल्म में इस एक्टर को नही लिया गया। आज हम बात करेंगे 24 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में जन्मे चंद्र मोहन जगन्नाथ वट्टल के बारे में जिन्हें फ़िल्मों में चन्द्र मोहन के नाम से जाना जाता है, उन्होंने कभी सोचा भी न था कि वो अपनी बड़ी ग्रे आंखों, आवाज़ के मॉड्यूलेशन और संवाद अदायगी की बदौलत 1930 और 1940 के दशक में हिंदी सिनेमा की कई महत्वपूर्ण और व्यावसायिक फ़िल्मों की सफलताओं का प्रतीक बन जाएंगे। वी. शांताराम, के. आसिफ, कमाल अमरोही से लेकर महबूब खान जैसे दिग्गज निर्देशक भी चंद्रमोहन की आँखों के कायल थे। चंद्रमोहन ने भले ही अपने 15 साल के फ़िल्मी सफर में महज़ 27 फ़िल्में की हों लेकिन हिंदी सिनेमा में विलेन का इतिहास जब-जब लिखा जाता है चंद्रमोहन का ज़िक्र ज़रूर होता है। फ़िल्मों के शौकीन और उन्हीं की तरह बर्ताव करने वाले चंद्रमोहन अपने पिता की मृत्यु के बाद दिल्ली जाकर बस गए जहाँ उन्होंने एक फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी में काम करना शुरु कर दिया। एक बार जब वो किसी सिलसिले में पूना गए तो प्रभात फिल्म स्टूडियो की पहली फिल्म डायरेक्ट कर रहे वी. शांताराम को उनकी आखें भा गयीं, चन्द्रमोहन के ग्रे कलर की गोलमटोल आँखों पर वो मोहित हो गए। वी. शांताराम को चंद्रमोहन की आँखों मे वो क्रूरता दिखी, जिसकी जरुरत साल 1934 में आई फ़िल्म "अमृतमंथन" के किरदार राजगुरू के लिए थी, और बस इस फिल्म के बाद ही चंद्रमोहन बतौर विलेन निर्देशकों व दर्शकों की पहली पसंद बने। चन्द्र मोहन बाद में सोहराब मोदी की फ़िल्म "पुकार' में शहंशाह जहांगीर के रूप में, निर्माता निर्देशक महबूब खान की फ़िल्म "हुमायूं" में रणधीर सिंह के रूप में और महबूब खान की ही फ़िल्म "रोटी" में सेठ लक्ष्मीदास के रूप में भूमिकाएँ निभाईं। रमेश सहगल की 1948 की फिल्म "शहीद" में राय बहादुर द्वारका नाथ के रूप में उन्होंने राम के पिता की ...
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    6 Min.
  • कहानी Bollywood के Jeevan की || Legendary Actor Jeevan || Podcast With Shubham Verma || #podcast
    Jul 16 2023
    एक समय था जब फिल्मों में विलेन इतना इम्पोर्टेन्ट होता था कि हीरो से अधिक चर्चे विलेन के होते थे। मगर एक उच्च कोटि का कलाकार उच्च ही होता है फिर चाहे उसे कोई भी भूमिका मिले। ऐसे ही एक महान कलाकार थे जीवन जिन्होंने फिल्मों में किरदार तो विलेन का निभाया पर असल जिंदगी में वो हीरो थे। Hello मेरा नाम है शुभम & this is "Podcast With Shubham Verma" [Intro Music] जीवन ऐसे समय के विलेन रहे जब फिल्मों में विलेन महत्वपूर्ण होते थे , जिन्होंने अपने जीवंत अभिनय से फिल्मी पर्दे पर वो छाप छोड़ी कि उनकी छवि विलेन की बन गई। आपको बता दें कि फिल्मों में जीवन ने भले ही विलेन का किरदार निभाया हो लेकिन असली जिन्दगी में वो हीरो थे, अत्यंत शालीन, खुशमिजाज और लोगों की भलाई करने वाले। जीवन ने जब फ़िल्मों में काम करना शुरू किया तो उस समय धार्मिक फिल्मों का प्रचलन था, धार्मिक फिल्मों में जब जीवन को नारद की भूमिका निभाने का मौका मिला तो वो इस भूमिका में इतने फिट बैठे कि नारद मुनि के रूप में आत्मसात हो गए। जीवन को दर्शकों ने नारद की भूमिका में इतना पसंद किया कि इसके बाद तो जब भी कोई फिल्मकार नारद मुनि पर फिल्म बनाता तो वह जीवन को ही इस किरदार के लिए बुलाता। जीवन ने बॉलीवुड सहित अलग-अलग भाषाओं की 60 से अधिक फिल्मों में नारद मुनि का किरदार निभाया। सबसे अधिक बार नारद मुनि की भूमिका निभाने का उनका रिकार्ड ‘लिम्का बुक ऑफ रिकाडर्स’ में दर्ज है। जीवन कहते थे कि फिल्मों में विलन के किरदार में उन्होंने जितने पाप किए थे, नारद की भूमिका में उससे अधिक बार नारायण-नारायण बोलकर उन्हें धो लिया। जीवन का जन्म एक कश्मीरी परिवार में 24 अक्टूबर 1915 को हुआ था। उनका असली नाम ओंकार नाथ धर था। जीवन जब तीन साल के थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। वो एक संयुक्त परिवार में रहते थे, उनके 24 भाई बहन थे। जीवन जब 18 साल के थे, उस समय में फिल्मों में एक्टिंग का इतना क्रेज था कि फिल्मों का शौक रखने वाला लगभग हर व्यक्ति फिल्मी कलाकारों में अपनी छवि देखता था और खुद भी फिल्मी दुनिया में भाग्य अजमाने का ख्वाब रखता था, यही वजह थी कि बॉलीवुड में तब ऐसे बहुत से कलाकार हुए हैं जिन्होंने घर से इजाज़त मिले बिना भी घर से भागकर फिल्मों में अपना कॅरियर बनाने को मुंबई की ओर रूख किया। जीवन भी फिल्मों में अभिनय का ऐसा ही शौक ...
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    3 Min.
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